संकट मोचन मंदिर : काशी का वह द्वार, जहां हर संकट हारता है और विश्वास जीतता है
वाराणसी
की
सुबह
केवल
सूरज
के
उगने
से
नहीं
होती,
वह
आरंभ
होती
है
घंटों
की
गूंज,
गंगा
की
लहरों
और
भक्ति
की
उस
अनुगूंज
से,
जो
आत्मा
को
भीतर
तक
छू
जाती
है।
इसी
आध्यात्मिक
स्पंदन
के
मध्य,
वृक्षों
की
छांव
और
श्रद्धा
की
छाया
में
स्थित
है
संकट
मोचन
हनुमान
मंदिर,
एक
ऐसा
स्थल,
जहां
इतिहास
केवल
लिखा
नहीं
गया,
बल्कि
जिया
गया
है।
यहां
हवा
में
एक
अदृश्य
संवाद
तैरता
है,
भक्त
और
भगवान
के
बीच
का।
कहते
हैं,
कुछ
स्थान
केवल
ईंट-पत्थरों
से
नहीं
बनते,
वे
बनते
हैं
आंसुओं,
तपस्या
और
उस
अटूट
विश्वास
से,
जो
समय
को
भी
झुकने
पर
मजबूर
कर
दे।
संकटमोचन
उसी
विश्वास
का
सजीव
प्रतिरूप
है।
जब
गोस्वामी
तुलसीदास
ने
अपने
भीतर
की
बेचैनी
को
भक्ति
में
ढाला,
तब
इसी
धरती
ने
उस
क्षण
को
देखा,
जब
स्वयं
हनुमान
जी
ने
एक
साधारण
रूप
में
आकर
अपने
भक्त
को
मार्ग
दिखाया।
वह
दृश्य
केवल
दर्शन
नहीं
था,
वह
आस्था
का
उद्घोष
था,
जिसमें
मनुष्य
और
ईश्वर
के
बीच
की
दूरी
समाप्त
हो
गई।
संकटमोचन
की
चौखट
पर
आज
भी
वही
अनुभूति
जीवित
है,
जहां
हर
आने
वाला
व्यक्ति
अपने
भीतर
के
प्रश्नों
के
साथ
आता
है
और
उत्तर
लेकर
लौटता
है।
यहां
प्रार्थनाएं
शब्द
नहीं
बनतीं,
वे
अनुभूति
बन
जाती
हैं;
और
आस्था
केवल
विश्वास
नहीं
रहती,
वह
साक्षात्कार
बन
जाती
है
सुरेश गांधी
काशी, अर्थात वाराणसी, सिर्फ एक शहर नहीं,
बल्कि वह अनादि चेतना
है, जहां समय ठहरकर
आध्यात्मिकता का अर्थ समझाता
है। यहां हर घाट
एक कथा है, हर
मंदिर एक इतिहास, और
हर आस्था एक अनुभव। इसी
दिव्य नगरी के मध्य
स्थित संकट मोचन हनुमान
मंदिर वह स्थल है,
जहां भक्ति ने ईश्वर को
साकार रूप में प्रकट
होते देखा है। यह
केवल मंदिर नहीं, यह विश्वास का
वह केंद्र है, जहां संकटों
से घिरे मनुष्य को
आश्रय मिलता है, जहां आंखों
में भरे आंसू प्रार्थना
बनते हैं और जहां
हर ‘असंभव’ संभव हो जाता
है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में यह मान्यता रही है कि जब भक्ति अपने चरम पर पहुंचती है, तो ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि काशी के इस पावन स्थल पर घटित एक ऐतिहासिक सत्य है। 16वीं शताब्दी में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जब रामकथा के माध्यम से जन-जन में भक्ति का संचार कर रहे थे, तब उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उन्हें अमरत्व प्रदान कर दिया। कथा के दौरान एक साधारण, कुष्ठग्रस्त ब्राह्मण प्रतिदिन उपस्थित रहता था। वह शांत भाव से कथा सुनता, किसी से संवाद नहीं करता।
तुलसीदास के मन में
जिज्ञासा जगी, परंतु रहस्य
का उद्घाटन तब हुआ जब
एक अलौकिक संकेत मिला, वह ब्राह्मण कोई
साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं पवनपुत्र हनुमान जी हैं। यह
जानकर तुलसीदास का मन व्याकुल
हो उठा। उन्होंने उस
ब्राह्मण का पीछा किया,
और फिर वह क्षण
आया जिसने इतिहास बदल दिया। एकांत
में पहुंचते ही वह ब्राह्मण
दिव्य प्रकाश में परिवर्तित हुआ
और अपने वास्तविक स्वरूप
में प्रकट हुआ, वह थे
संकटमोचन, भक्तवत्सल हनुमान।
चित्रकूट की ओर : जहां भक्त को मिला भगवान
हनुमान जी के दर्शन से अभिभूत तुलसीदास ने अपने आराध्य भगवान राम के दर्शन की इच्छा व्यक्त की। हनुमान जी ने उन्हें मार्ग बताया, चित्रकूट। तुलसीदास चित्रकूट पहुंचे। वहां संतों की भीड़ थी, भक्ति का वातावरण था, और उसी भीड़ में एक साधारण बालक के रूप में स्वयं भगवान राम उपस्थित थे। तुलसीदास ने उन्हें पहचान लिया :‘-
“चित्रकूट के
घाट
पर
भई
संतन
की
भीड़,
तुलसीदास
चंदन
घिसय
तिलक
देत
रघुबीर।”
यह केवल एक
चौपाई नहीं, बल्कि उस क्षण का
जीवंत चित्र है, जब भक्त
और भगवान आमने-सामने खड़े
थे।
संकटमोचन की स्थापना : जहां आस्था ने आकार लिया
भगवान राम के दर्शन
के पश्चात तुलसीदास पुनः काशी लौटे।
जिस स्थान पर उन्हें हनुमान
जी के दर्शन हुए
थे, वहीं उन्होंने हनुमान
जी की मूर्ति स्थापित
की। यह वही स्थान
है, जो आज संकटमोचन
मंदिर के रूप में
विश्वभर में प्रसिद्ध है।
यहां स्थापित हनुमान जी की मूर्ति
अन्य मंदिरों से भिन्न है।
यह केवल एक प्रतिमा
नहीं, बल्कि वह दिव्य प्रतीक
है, जिसमें भक्तों को साक्षात उपस्थिति
का अनुभव होता है। सिन्दूरी
रंग से आच्छादित यह
मूर्ति दक्षिणमुखी है, और विशेष
बात यह है कि
इसकी दृष्टि सदैव भगवान राम
की ओर रहती है।
यह केवल स्थापत्य नहीं,
बल्कि भक्ति की पराकाष्ठा का
प्रतीक है।
तुलसीघाट : जहां शब्द बने शास्त्र
मंदिर का वर्तमान स्वरूप् : परंपरा और आधुनिकता का संगम
लगभग साढ़े आठ
एकड़ में फैला संकटमोचन
मंदिर परिसर आज भी अपनी
मूल आध्यात्मिक ऊर्जा को संजोए हुए
है। हरे-भरे वृक्ष,
शांत वातावरण, और भक्ति से
ओतप्रोत श्रद्धालु, यह सब मिलकर
एक ऐसा अनुभव रचते
हैं, जो शब्दों से
परे है। मंदिर में
नियमित रूप से चारों
पहर आरती होती है।
सुबह की आरती भोर
की पहली किरण के
साथ शुरू होती है,
जब घंटों और घड़ियालों की
ध्वनि वातावरण को दिव्यता से
भर देती है। शाम
की आरती में पूरा
परिसर हनुमान चालीसा के स्वर से
गूंज उठता है, मानो
स्वयं आस्था संगीत बन गई हो।
श्रद्धा का सागर : मंगलवार और शनिवार का दृश्य
हर मंगलवार और
शनिवार को यहां श्रद्धालुओं
की अपार भीड़ उमड़ती
है। कोई अपने जीवन
की परेशानियों से मुक्ति की
कामना लेकर आता है,
कोई सफलता की प्रार्थना करता
है, तो कोई केवल
अपने आराध्य के दर्शन के
लिए। हाथों में प्रसाद, आंखों
में विश्वास, और होठों पर
‘जय बजरंगबली’, यह दृश्य केवल
धार्मिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है। यहां
चढ़ने वाला बेसन का
लड्डू केवल प्रसाद नहीं,
बल्कि श्रद्धा का प्रतीक है।
सिन्दूर और तेल अर्पित
कर भक्त अपने संकटों
को हनुमान जी के चरणों
में समर्पित करते हैं।
सांस्कृतिक चेतना का केंद्र
संकटमोचन मंदिर केवल धार्मिक स्थल
नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर भी है। यहां
आयोजित होने वाला संकटमोचन
संगीत समारोह भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक प्रतिष्ठित
आयोजन है, जहां देश-विदेश के कलाकार अपनी
प्रस्तुति देते हैं। सावन,
रामनवमी और हनुमान जयंती
के अवसर पर मंदिर
परिसर एक जीवंत उत्सव
में परिवर्तित हो जाता है,
जहां भक्ति और संस्कृति एक
साथ प्रवाहित होती हैं।
आस्था की परीक्षा : 2006 का हमला
7 मार्च 2006, यह वह दिन
था जब आतंक ने
काशी की शांति को
भंग करने का प्रयास
किया। संकटमोचन मंदिर में हुए विस्फोट
ने क्षण भर के
लिए भय का वातावरण
बना दिया, परंतु आस्था की शक्ति इससे
कहीं अधिक प्रबल निकली।
अगले ही दिन हजारों
श्रद्धालु मंदिर पहुंचे, यह साबित करने
के लिए कि विश्वास
को कोई भय पराजित
नहीं कर सकता। यह
घटना केवल एक त्रासदी
नहीं, बल्कि आस्था की विजय का
प्रतीक बन गई।
मालवीय जी का योगदान
मंदिर
के जीर्णोद्धार में मदन मोहन
मालवीय का महत्वपूर्ण योगदान
रहा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक के
रूप में उन्होंने काशी
की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत
को संरक्षित करने का कार्य
किया। उनके प्रयासों से
संकटमोचन मंदिर को आधुनिक स्वरूप
मिला, परंतु इसकी मूल आत्मा
आज भी वैसी ही
है।
संकटमोचन : केवल नाम नहीं, अनुभव है
जहां भक्ति ही सबसे बड़ा सत्य है
काशी का संकटमोचन
मंदिर हमें यह सिखाता
है कि भक्ति केवल
पूजा नहीं, बल्कि जीवन का मार्ग
है। जब मनुष्य अपने
अहंकार को त्यागकर पूर्ण
समर्पण के साथ ईश्वर
की ओर बढ़ता है,
तब उसे न केवल
समाधान मिलता है, बल्कि जीवन
का वास्तविक अर्थ भी समझ
में आता है। यह
मंदिर आज भी उसी
सत्य का जीवंत प्रमाण
है, जहां सच्ची आस्था
हो, वहां भगवान स्वयं
प्रकट होते हैं, और
जहां भगवान हों, वहां कोई
संकट स्थायी नहीं रहता।
मंदिर परिसर में तुलसीदास ने लिखी रामचरितमानस
बात 1608 से 1611 के बीच उस वक्त की है जब महान कवि गोस्वमी तुलसीदास अपने ही उपासक भगवान श्रीराम की पटकथा लिख रहे थे। वह जगह आज भी तुलसी आश्रम व घाट के रुप में स्थापित है। मान्यता है कि गंगा घाट के पास आज भी मौजूद विशाल पीपल पेड़ के नीचे बैठकर ही तुलसीदास जी रामचरित मानस की चौपाईयां लिखा करते थे। चूकि भगवान हनुमान अवतार भगवान शिव का शक्तिशाली और रुद्र अवतार के रूप में जाना जाता है, इसलिए चौपाई लिखने से पहले तुलसीदास जी ने अपने ही हाथ से निर्मित बाल हनुमान मूर्ति की स्थापना की। जिसकी ऐतिहासिकता आज भी कायम है और ये मंदिर वर्तमान में लोगों की श्रद्धा का केन्द्र भी बना हुआ हैं। दक्षिणामुखी हनुमान जी की इस मूर्ति को काफी जागृत माना जाता है। इस मंदिर के उपरी तल पर राम-जानकी मंदिर है जिसकी स्थापना भी तुलसी दास जी ने ही की थी। इस मंदिर के पास ही एक कोने में तुलसीदास जी का चित्र लगाया गया है। यह वही स्थान है जहां तुलसीदास जी बैठकर चौपाईयां लिखा करते थे। रोजाना चौपाईयां लिखने से पहले तुलसीदास जी अपने आराध्य हनुमान जी की अपने ही स्थापित मूर्ति पूजन किया करते थे।
मौजूद है तुलसीदास की काव्य ग्रंथ : बिशम्भरनाथ मिश्र
मंदिर के महंत बिशम्भरनाथ
मिश्र के मुताबिक तुलसीदास
का सर्वाधिक समय अस्सी घाट
पर ही बीता, जिसे
अब तुलसीघाट कहा जाता है।
यही तुलसी मंदिर या तुलसीदास का
अखाड़ा है, जिसमें गोस्वामी
जी रहते थे। यही
उनका देहावसान हुआ। संवत 1680 अस्सी
गंग के तीर। श्रावण
कृष्ण तीज शनि तुलसी
तज्यों शरीर।। उनका बचपन बहुत
ही कष्टमय व्यतीत हुआ, भिक्षाटन तक
करना पड़ा। दर-दर
भटकना पड़ा। उनकी शादी
रत्नावली नाम की कंया
से हुई थी। उनकी
खड़ाऊं आज भी तुलसीघाट
में महंत परिवार के
पास सुरक्षित है। जिस नाव
पर बैठकर वह मानस लिखा
करते थे, उसका टुकड़ा
आज भी वहां सहेज
कर रखा गया है।
इस दौरान वह कई-कई
दिनों तक घाट के
ऊपर ही बैठे रह
जाते थे और मानस
को लिखते थे। उनके रहने
के घर को राजा
टोडरमल ने बनवाया था।
रामचरित मानस कवितावली, विनय
पत्रिका, दोहावली, श्रीकृष्ण गीतावली, पार्वती मंगल रामाज्ञा, कृष्ण
हनुमान, बहूक हनुमान चालिसा,
रामलला नक्षुजानकी मंगल, वैराज्ञ संदीपनी आदि उनके ग्रंथों
की कुछ पांडुलिपियां अखाड़ा
गोस्वामी तुलसीदास, तुलसीघाट में सुरक्षित है।
चारों पहर होती है आरती
मंदिर में हनुमान जी
की पूजा नियत समय
पर प्रतिदिन आयोजित होती है। पट
खुलने के साथ ही
आरती सुबह साढ़े 5 बजे
घण्ट-घडियाल नगाड़ों और हनुमान चालीसा
के साथ होती है
जबकि संध्या आरती रात नौ
बजे सम्पन्न होती है। आरती
की खास बात यह
है कि सबसे पहले
मंदिर में स्थापित नरसिंह
भगवान की आरती होती
है। मौसम के अनुसार
आरती के समय में
आमूलचूल परिवर्तन भी हो जाता
है। दिन में 12 से
3 बजे तक मंदिर का
कपाट बंद रहता है।
आरती के दौरान पूरा
मंदिर परिसर हनुमान चालीसा से गूंज उठता
है। हनुमान जी के प्रति
श्रद्धा से ओत-प्रोत
भक्त जमकर जयकारे लगाते
हैं।
निकलती है आकर्षक झांकी
कार्तिक महीने में एक और
बड़ा आयोजन नरकासुर पर हनुमान विजय
के उपलक्ष्य में झांकी सजा
कर होता है। मंदिर
में राम-विवाह का
आयोजन भी हर्षोल्लास के
साथ होता है। मंदिर
में मानस नवाह पाठ
होता है जिसे 111 ब्राह्मणों
द्वारा सम्पन्न कराया जाता है। हनुमान
जी का श्रृंगार भी
होता है। अन्त में
दो दिन का भजन
सम्मेलन भी होता है।
इस भजन सम्मेलन में
काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते
हैं। इस मंदिर की
खासियत यह है कि
यहां बाहर से प्रसाद
चढ़ाने के लिए नहीं
लेकर आना पड़ता है।
मंदिर परिसर में ही देशी
घी के लड्डू और
पेड़ा की दुकान है।
जहां श्रद्धालु रसीद कटवाकर प्रसाद
लेते हैं। यहां के
लड्डू का प्रसाद तो
बहुत प्रसिद्ध है। इसकी विशिष्टता
यह है कि कई
दिनों बाद भी प्रसाद
खराब नहीं होता है।
मंदिर में आम दर्शनार्थियों
की सुविधाओं के लिए भी
कई इंतजाम किये गये हैं।
मसलन वाहन पार्किंग के
लिए स्टैंड और मोबाइल, जूता,
चप्पल रखने की निशुल्क
व्यवस्था की गयी है।
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