Sunday, 14 June 2026

बोतल में पानी नहीं, मौत का सौदा! हर घूंट पर खतरा

जीवनदायिनी बूंदों पर मुनाफाखोरों का कब्जा

बोतल में पानी नहीं, मौत का सौदा! हर घूंट पर खतरा 

यूपी के 15 से अधिक जिलों में पैकेज्ड पानी की बोतलों में मिला खतरनाक बैक्टीरिया, वाराणसी समेत पूर्वांचल में बढ़ा खतरा

खाली बोतलों में दोबारा पानी भरकर बेचने का गोरखधंधा भी बना चिंता का कारण

खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई के बाद कई कंपनियों की बिक्री पर रोक

विशेषज्ञ बोलेसिर्फ आरओ नहीं, सुरक्षित भंडारण भी जरूरी

सुरेश गांधी

वाराणसी। पानी... जिसे भारतीय संस्कृति में जीवन, अमृत और आस्था का प्रतीक माना गया है। वही पानी आज बाजार की सबसे बड़ी मुनाफाखोर वस्तु बनता जा रहा है। जिस बोतल को उपभोक्ता अपनी सुरक्षा का भरोसा मानकर खरीदता है, उसके भीतर यदि बीमारी पल रही हो तो यह केवल खाद्य सुरक्षा का सवाल नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का आईना है। मतलब साफ है भीषण गर्मी के बीच प्यास बुझाने के लिए खरीदी जाने वाली सीलबंद पानी की बोतल अब भरोसे की नहीं, बल्कि चिंता की वजह बनती जा रही है।

खासकर, उत्तर प्रदेश में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की जांच में 15 से अधिक जिलों से लिए गए पैकेज्ड पेयजल के नमूनों में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया मिलने से हड़कंप मच गया है। इनमें वाराणसी, चंदौली, प्रयागराज, गोरखपुर, आजमगढ़, लखनऊ, बाराबंकी, रायबरेली, लखीमपुर खीरी, अंबेडकरनगर, गोंडा, चित्रकूट, उन्नाव, रामपुर और मैनपुरी जैसे जिले शामिल हैं। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद संबंधित पैकेज्ड वाटर प्लांटों की बिक्री पर रोक लगाने के साथ बाजार में भेजी गई खेप वापस मंगाने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसे समय में वाराणसी और पूर्वांचल के कई हिस्सों में खाली बोतलों में दोबारा पानी भरकर बेचने का अवैध कारोबार भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, घाट, टैक्सी स्टैंड और भीड़भाड़ वाले इलाकों में प्रतिदिन हजारों यात्री इन्हीं बोतलों पर भरोसा कर अपनी प्यास बुझाते हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल तो यही क्या सभी पैकेज्ड वाटर प्लांटों की नियमित जांच हो रही है? रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और पर्यटन स्थलों पर बिक रहे पानी की गुणवत्ता कौन सुनिश्चित करेगा? खाली बोतलों की अवैध री-पैकिंग पर कब लगेगी प्रभावी रोक? क्या उपभोक्ताओं को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए संयुक्त अभियान चलाया जाएगा? प्यास बुझाने के लिए खरीदी गई एक बोतल यदि बीमारी का कारण बन जाए, तो यह केवल उपभोक्ता की नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की विफलता है। इसलिए जरूरत केवल कार्रवाई की नहीं, बल्कि नियमित निगरानी, कड़े गुणवत्ता नियंत्रण और जनजागरूकता की भी है।

खाली बोतलें बन रही हैं कमाई का जरिया

स्थानीय सूत्र बताते हैं कि होटलों, ढाबों, रेस्टोरेंट और सार्वजनिक स्थलों से बड़ी संख्या में खाली बोतलें कबाड़ियों के जरिए इकट्ठा की जाती हैं। इसके बाद इन्हें छोटे-छोटे फिल्टर प्लांटों या अवैध पैकेजिंग केंद्रों पर ले जाकर सामान्य आरओ या फिल्टर का पानी भर दिया जाता है। नकली सील, ढक्कन और लेबल लगाकर इन्हें फिर से बाजार में उतार दिया जाता है। आम ग्राहक के लिए असली और नकली बोतल की पहचान करना आसान नहीं होता। सबसे अधिक खतरा रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और धार्मिक स्थलों पर दिखाई देता है, जहां जल्दी में यात्री बिना जांचे-परखे पानी खरीद लेते हैं।

जांच में क्या मिला?

एफएसडीए द्वारा एकत्र किए गए नमूनों की जांच में कई बोतलों में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी मिली। कुछ नमूनों में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे आवश्यक खनिज भी निर्धारित मानक से कम पाए गए। इसका अर्थ है कि पानी केवल सूक्ष्मजीवों से दूषित था, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी मानकों के अनुरूप नहीं थी। कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पानी में मलजनित प्रदूषण का संकेत माना जाता है। यदि इसमें . कोलाई (Escherichia coli) जैसे हानिकारक जीवाणु मौजूद हों तो यह दस्त, उल्टी, पेट दर्द, बुखार, पेचिश, टाइफाइड, हैजा और गंभीर मामलों में किडनी फेल होने जैसी स्थितियां पैदा कर सकता है।

देशभर में बढ़ रही चिंता

पिछले वर्ष इंदौर में पैकेज्ड पेयजल में वायरस मिलने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर जांच अभियान चलाया गया था। इसके बाद विभिन्न राज्यों में कई पैकेज्ड वाटर इकाइयों के नमूने लिए गए। उत्तर प्रदेश की हालिया जांच ने एक बार फिर संकेत दिया है कि पैकेज्ड पानी के कारोबार में गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं।

सिर्फ बोतल नहीं, घर का आरओ भी हो सकता है खतरा

लोगों की यह धारणा है कि आरओ से निकला पानी हमेशा सुरक्षित होता है। लेकिन हाल में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन ने इस धारणा पर नया सवाल खड़ा किया है। अध्ययन के अनुसार, समस्या कई बार आरओ मशीन में नहीं बल्कि उसके बाद शुरू होती है। शोधकर्ताओं ने 262 फिल्टर किए गए पानी के नमूनों की जांच की, जिनमें से 81 में . कोलाई बैक्टीरिया पाया गया। जांच में स्पष्ट हुआ कि अधिकांश मामलों में पानी आरओ से निकलने के बाद दूषित हुआ।

कैसे दोबारा दूषित हो जाता है पानी?

विशेषज्ञों के अनुसार कई सामान्य घरेलू आदतें शुद्ध पानी को भी असुरक्षित बना देती हैं  गंदे प्लास्टिक या स्टील के बर्तनों में पानी रखना। एक ही बर्तन को बिना धोए बार-बार भरना। खुले बर्तनों में पानी संग्रहित करना। आरओ का पानी रखने से पहले कंटेनर को नल के पानी से धो देना। भंडारण पात्र के अंदर हाथ डालना। समय पर आरओ की सर्विसिंग कराना। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि भंडारण पात्र में थोड़ी भी गंदगी रह जाए तो बैक्टीरिया तेजी से बढ़ सकते हैं।

पूर्वांचल में तेजी से बढ़ी फिल्टर पानी की मांग

पूर्वांचल में भूजल की गुणवत्ता, बढ़ती आबादी और धार्मिक पर्यटन के कारण पैकेज्ड पानी तथा आरओ जल की मांग लगातार बढ़ रही है। वाराणसी जैसे शहर में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। गर्मियों में मांग कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि छोटे-छोटे आरओ प्लांट और फिल्टर जल केंद्र बड़ी संख्या में खुल गए हैं। हालांकि इनमें से कई इकाइयों के पास गुणवत्ता परीक्षण, नियमित लाइसेंस नवीनीकरण और मानक संचालन प्रणाली का अभाव बताया जाता है।

क्या कहते हैं मानक?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार पीने के पानी का टीडीएस (टोटल डिसॉल्वड सॉलिड्स) लगभग 200 से 250 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच होना उपयुक्त माना जाता है ताकि शरीर को आवश्यक प्राकृतिक खनिज मिल सकें। अत्यधिक कम टीडीएस वाला पानी भी लंबे समय तक स्वास्थ्य के लिए आदर्श नहीं माना जाता। सरकार ने सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (CWPP) स्थापित करने के साथ-साथ वाटर प्यूरीफायर कंपनियों के लिए फिल्टर बदलने की समय-सीमा और रखरखाव संबंधी जानकारी देना भी अनिवार्य किया है।

विशेषज्ञों की सलाह

हमेशा भरोसेमंद विक्रेता से ही सीलबंद पानी खरीदें। बोतल की सील, ढक्कन, बैच नंबर और निर्माण तिथि अवश्य जांचें। उपयोग के बाद बोतल को दबाकर या काटकर ही फेंकें, ताकि उसका दोबारा इस्तेमाल हो सके। आरओ फिल्टर की समय पर सर्विसिंग कराएं। पानी हमेशा ढक्कन वाले साफ बर्तन में रखें। पानी के भंडारण वाले बर्तन की नियमित सफाई करें।

पैकेज्ड पानी का बढ़ता बाजार

भारत में पैकेज्ड पेयजल उद्योग का आकार 30,000 करोड़ रुपये से अधिक आंका जाता है। गर्मियों में पैकेज्ड पानी की मांग सामान्य दिनों की तुलना में 30–50 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार देश में प्रतिदिन कई करोड़ लीटर पैकेज्ड और आरओ जल की खपत होती है। वाराणसी जैसे धार्मिक और पर्यटन शहर में प्रतिदिन लाखों पानी की बोतलें बिकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती मांग के साथ नकली पैकेजिंग और दोबारा भरी गई बोतलों का कारोबार भी तेजी से फैल रहा है।

No comments:

Post a Comment

जीवनदायिनी बूंदों पर मुनाफाखोरों का कब्जा

बोतल में पानी नहीं , मौत का सौदा ! जीवनदायिनी बूंदों पर मुनाफाखोरों का कब्जा पानी ... जिसे भारतीय संस्कृति में जीवन , अमृत...