Monday, 22 June 2026

लखनऊ अग्निकांड : आग से ज्यादा घातक साबित हुई लापरवाही…!

14 जिंदगियों की कीमत कौन चुकाएगा?

लखनऊ अग्निकांड : आग से ज्यादा घातक साबित हुई लापरवाही…! 

लखनऊ के अलीगंज में धधकी इमारत के साथ सुरक्षा व्यवस्था की भी खुली पोल. पहले कोचिंग सेंटर, फिर गेमिंग जोन की चर्चा में उलझा घटनाक्रम, लेकिन सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा इंतजामों का. हर हादसे के बाद जांच, मुआवजा और कार्रवाई का सिलसिला कब तक? क्या इंसानी जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है? शुरुआत में इसे कोचिंग सेंटर हादसा बताया गया, बाद में प्रशासन ने स्पष्ट किया कि भवन में गेमिंग जोन संचालित था और नीचे पेट शॉप थी। लेकिन इस तथ्य से त्रासदी का दर्द कम नहीं होता। सवाल यह नहीं कि वहां कोचिंग थी या गेमिंग कंपनी, सवाल यह है कि आखिर ऐसी इमारत में सुरक्षा के क्या इंतजाम थे, जहां कुछ ही मिनटों में दर्जनों लोग मौत और जिंदगी के बीच झूलने लगे 

सुरेश गांधी

लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया इलाके में सोमवार को लगी आग ने सिर्फ एक इमारत को नहीं जलाया, बल्कि उन तमाम दावों को भी राख कर दिया, जिनमें बड़े शहरों की व्यावसायिक इमारतों को सुरक्षित बताया जाता है। कुछ ही मिनटों में धुएं और आग की लपटों ने पूरी इमारत को अपनी गिरफ्त में ले लिया। अंदर मौजूद लोग बाहर निकलने के लिए छज्जों तक पहुंच गए। किसी ने खिड़की का सहारा लिया, तो किसी ने जान बचाने के लिए ऊंचाई से छलांग लगा दी। जब तक दमकल की टीम आग पर काबू पाती, तब तक 14 परिवारों की दुनिया उजड़ चुकी थी।

हादसे के शुरुआती घंटों में यह जानकारी सामने आई कि इमारत में कोचिंग सेंटर और लाइब्रेरी संचालित थी, जिसमें छात्र-छात्राएं फंस गए। बाद में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भवन के भूतल पर पेट शॉप थी, जबकि ऊपर गेमिंग जोन संचालित था, जहां कर्मचारी गेमिंग सॉफ्टवेयर पर काम कर रहे थे। लेकिन यह तथ्य बदल जाने से हादसे का स्वरूप नहीं बदलता। चाहे वहां विद्यार्थी हों या कर्मचारी, सवाल एक ही हैक्या भवन में आग जैसी आपदा से निपटने की पर्याप्त व्यवस्था थी?

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को संभलने का अवसर ही नहीं मिला। घना धुआं कुछ ही मिनटों में सीढ़ियों और कमरों में भर गया। कई लोग बाहर निकलने का रास्ता खोजते रहे, लेकिन लपटों और धुएं ने उन्हें घेर लिया। राहत और बचाव अभियान के दौरान दमकलकर्मियों ने कड़ी मशक्कत कर कई लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला, लेकिन कुछ जिंदगियां बचाई नहीं जा सकीं।

यह त्रासदी कई गंभीर सवाल छोड़ गई है। क्या भवन में फायर सेफ्टी उपकरण मौजूद थे? क्या अग्निशमन विभाग की अनापत्ति (एनओसी) ली गई थी? क्या आपातकालीन निकास का प्रबंध था? क्या नियमित सुरक्षा ऑडिट हुआ था? यदि नीचे लगी आग ने कुछ ही मिनटों में ऊपर तक फैलकर लोगों को फंसा दिया, तो इसका अर्थ है कि भवन की सुरक्षा व्यवस्था कहीं कहीं गंभीर रूप से विफल थी।

हर बड़े हादसे के बाद प्रशासन सक्रिय दिखाई देता है। इस बार भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल संज्ञान लिया, राहत एवं बचाव कार्य तेज करने के निर्देश दिए और डीजीपी तथा अपर मुख्य सचिव (गृह) को मौके पर भेजकर विस्तृत रिपोर्ट तलब की। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने भी घटनास्थल पहुंचकर बचाव कार्यों की निगरानी की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मृतकों के प्रति शोक व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से प्रत्येक मृतक के परिजनों को दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की सहायता देने की घोषणा की।

सरकार की त्वरित सक्रियता निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या ऐसी नौबत आने से पहले प्रशासन उतनी ही गंभीरता से सुरक्षा मानकों की निगरानी करता है? यदि फायर ऑडिट समय पर होते, यदि भवनों का नियमित निरीक्षण होता और यदि नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाता, तो शायद यह दिन देखने की नौबत नहीं आती। यह भी जांच का विषय है कि भवन का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा था। एक ही इमारत में अलग-अलग प्रकार के व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित हो रहे थे। क्या इन सभी गतिविधियों के लिए आवश्यक अनुमतियां थीं? क्या भवन की क्षमता के अनुरूप लोगों की आवाजाही थी? क्या किसी विभाग ने समय-समय पर इसकी जांच की? यदि नहीं, तो यह केवल भवन मालिक की नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था की भी विफलता है।

इस हादसे में दमकल कर्मियों, पुलिस और स्थानीय लोगों की भूमिका उल्लेखनीय रही। कई लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों को बचाने का प्रयास किया। ऐसे कठिन समय में उनका साहस और समर्पण प्रशंसनीय है। लेकिन किसी भी सभ्य व्यवस्था का उद्देश्य यह होना चाहिए कि लोगों को ऐसी परिस्थितियों का सामना ही करना पड़े। लखनऊ की यह घटना पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी है। शहरों में तेजी से बहुमंजिला व्यावसायिक भवन खड़े हो रहे हैं। कहीं कोचिंग संस्थान, कहीं कार्यालय, कहीं हॉस्टल, कहीं कैफे और कहीं गेमिंग जोन संचालित हैं। लेकिन अधिकांश स्थानों पर अग्नि सुरक्षा केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। कई भवनों में आपातकालीन निकास अवरुद्ध हैं, अग्निशमन यंत्र निष्क्रिय पड़े हैं और सुरक्षा अभ्यास कभी नहीं कराए जाते।

अब समय गया है कि पूरे प्रदेश में व्यापक फायर सेफ्टी अभियान चलाया जाए। सभी व्यावसायिक भवनों, कोचिंग संस्थानों, कार्यालयों, हॉस्टलों और बहुमंजिला परिसरों का विशेष ऑडिट कराया जाए। जिन भवनों में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा है, उनके संचालन पर तत्काल रोक लगाई जाए। साथ ही केवल भवन स्वामी ही नहीं, बल्कि लापरवाही बरतने वाले संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो। इस हादसे का सबसे दर्दनाक पक्ष यह है कि जिन लोगों ने सुबह घर से निकलते समय शाम को लौटने का वादा किया होगा, वे अब कभी वापस नहीं आएंगे। किसी परिवार का बेटा, किसी की बेटी, किसी का भाई या बहन अब केवल यादों में रह जाएंगे। आर्थिक सहायता और जांच के आदेश इस पीड़ा को कम नहीं कर सकते।

लखनऊ का पुरनिया अग्निकांड केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि इस त्रासदी के बाद भी सुरक्षा मानकों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो अगली आग किसी और शहर, किसी और इमारत और किसी अन्य परिवार की खुशियां छीन सकती है। व्यवस्था की असली परीक्षा राहत कार्य के बाद शुरू होती हैजब दोष तय होते हैं, नियम सख्ती से लागू होते हैं और भविष्य की त्रासदियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं। यही इस हादसे से मिलने वाला सबसे बड़ा सबक भी है। यह घटना केवल आग लगने की नहीं, बल्कि व्यवस्था की लापरवाही, नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाने वाली त्रासदी है।

आग नहीं, व्यवस्था की विफलता ने ली 14 जानें

हर बड़े हादसे के बाद एक जैसी तस्वीर सामने आती है। धुएं से भरी इमारत, चीखते लोग, छज्जों से छलांग लगाते युवक, दमकल की गाड़ियां, नेताओं के दौरे, मुआवजे की घोषणा और जांच के आदेश। लेकिन कुछ दिन बाद सब सामान्य हो जाता है। इस बार भी वही हुआ। आग इतनी तेजी से फैली कि ऊपर मौजूद लोगों को बाहर निकलने का अवसर तक नहीं मिला। किसी ने जान बचाने के लिए छलांग लगाई, कोई धुएं में फंस गया। जो कुछ मिनट पहले अपने भविष्य के सपने देख रहे थे, वे देखते ही देखते काल के गाल में समा गए।

कोचिंग या गेमिंग जोन... लेकिन असली मुद्दा क्या है?

शुरुआती सूचना में कोचिंग सेंटर और लाइब्रेरी की बात सामने आई। बाद में वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि वहां गेमिंग जोन संचालित था और कर्मचारी सॉफ्टवेयर पर कार्य करते थे। लेकिन यह बहस गौण है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भवन में अग्निशमन के पर्याप्त उपकरण मौजूद थे? क्या इमरजेंसी निकास था? क्या फायर एनओसी वैध थी? क्या नियमित सुरक्षा ऑडिट हुआ था? यदि आग नीचे लगी तो ऊपर मौजूद लोगों के बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता क्यों नहीं था? यदि इन प्रश्नों का उत्तर "नहीं" है, तो यह हादसा नहीं बल्कि लापरवाही से हुई सामूहिक मृत्यु है।

हर हादसे के बाद जागता है प्रशासन     

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तुरंत संज्ञान लिया। डीजीपी और अपर मुख्य सचिव गृह को मौके पर भेजा। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक स्वयं पहुंचे। राहत एवं बचाव कार्य तेज हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गहरा शोक व्यक्त करते हुए मृतकों के परिजनों के लिए दो-दो लाख और घायलों के लिए 50 हजार रुपये की सहायता की घोषणा की. इन कदमों की सराहना होनी चाहिए। लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि यदि सुरक्षा मानकों का पालन पहले कराया गया होता तो शायद इन घोषणाओं की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

क्या केवल भवन मालिक ही दोषी है?

ऐसे मामलों में केवल भवन स्वामी को गिरफ्तार कर देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। जांच का दायरा व्यापक होना चाहिएभवन निर्माण की अनुमति किसने दी? फायर विभाग ने निरीक्षण कब किया? नगर निगम ने व्यवसाय संचालन की अनुमति किन आधारों पर दी? सुरक्षा मानकों का पालन क्यों नहीं कराया गया? यदि अनियमितता थी तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? जब तक पूरी जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे।

हर शहर में खड़े हैं ऐसे 'मौत के मकान'

देश के लगभग हर शहर में ऐसी बहुमंजिला इमारतें हैं, जहांबेसमेंट में दुकानें, ऊपर कोचिंग, कहीं हॉस्टल, कहीं कार्यालय, कहीं गेमिंग जोन, कहीं कैफे, सब कुछ एक ही भवन में संचालित होता है। लेकिन अग्निशमन व्यवस्था लगभग शून्य होती है। यह हादसा पूरे देश के लिए चेतावनी है।

सिर्फ जांच नहीं, सुधार भी जरूरी

इस घटना के बाद सरकार को केवल दोषियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जरूरी है किप्रदेशभर में सभी व्यावसायिक भवनों का फायर ऑडिट हो। बिना फायर एनओसी संचालित संस्थानों को तत्काल बंद किया जाए। हर कोचिंग, कार्यालय, गेमिंग जोन और व्यावसायिक प्रतिष्ठान में इमरजेंसी ड्रिल अनिवार्य हो। भवनों में दो सुरक्षित निकास मार्ग सुनिश्चित किए जाएं। नियमों का उल्लंघन करने वालों पर केवल जुर्माना नहीं, आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।

मानवीय पीड़ा सबसे बड़ी सच्चाई

इस हादसे ने केवल 12 लोगों की जान नहीं ली, बल्कि दर्जनों परिवारों के सपनों को भी राख कर दिया। किसी मां ने बेटा खोया होगा, किसी पिता का सहारा छिन गया होगा, किसी बहन की राखी सूनी हो गई होगी, तो किसी परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य अब कभी घर नहीं लौटेगा। मुआवजे की राशि इस दर्द की भरपाई नहीं कर सकती। लखनऊ का यह अग्निकांड एक चेतावनी है कि यदि सुरक्षा नियम केवल कागजों तक सीमित रहे तो अगली त्रासदी कहीं भी हो सकती है। सरकार की त्वरित कार्रवाई स्वागतयोग्य है, लेकिन न्याय तभी पूरा होगा जब जांच निष्पक्ष हो, जिम्मेदार अधिकारियों तक जवाबदेही पहुंचे और पूरे प्रदेश में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जाए। हर हादसे के बाद मोमबत्तियां जलाने और मुआवजे की घोषणा करने से अधिक आवश्यक है कि ऐसी परिस्थितियां दोबारा पैदा ही हों। यदि इस त्रासदी के बाद भी व्यवस्था नहीं बदली, तो आने वाली हर दुर्घटना केवल हादसा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता मानी जाएगी।

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