Tuesday, 16 June 2026

श्री काशी विश्वनाथ धाम : जहां चढ़ावे से बड़ा है विश्वास

श्री काशी विश्वनाथ धाम : जहां चढ़ावे से बड़ा है विश्वास 

राम मंदिर में दान पर उठे सवालों के बीच काशी विश्वनाथ धाम की पारदर्शी व्यवस्था बनी राष्ट्रीय मिसाल; 56 दान कुंड, खुले में गिनती और हर रुपये का पूरा लेखा-जोखा

सुरेश गांधी

वाराणसी. देश इस समय मंदिरों में चढ़ावे की पारदर्शिता को लेकर नई बहस के दौर से गुजर रहा है। एक ओर अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दान राशि को लेकर उठे विवाद सुर्खियों में हैं, वहीं दूसरी ओर काशी विश्वनाथ धाम एक ऐसे उदाहरण के रूप में सामने है, जहां करोड़ों रुपये के चढ़ावे के बावजूद आज तक एक रुपये की हेराफेरी का आरोप तक नहीं लगा। यह केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि उस विश्वास की रक्षा का मॉडल है, जिसे करोड़ों श्रद्धालु भगवान शिव के चरणों में अर्पित करते हैं। 

काशी विश्वनाथ धाम में दान केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व भी है। यहां दानपात्र में गिरने वाले हर सिक्के और हर नोट का हिसाब उसी पारदर्शिता से रखा जाता है, जैसी किसी बड़े बैंक या वित्तीय संस्थान में होती है। यही वजह है कि बाबा के दरबार में चढ़ावा हमेशा श्रद्धा का विषय रहा, कभी विवाद का नहीं। विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद के अध्यक्ष एवं वाराणसी के मंडलायुक्त एस. राजलिंगम बताते हैं कि धाम में दान कई माध्यमों से प्राप्त होता है। श्रद्धालु 56 दान कुंडों में नकद दान करते हैं, क्यूआर कोड के माध्यम से डिजिटल दान देते हैं, कार्यालय में रसीद लेकर दान जमा करते हैं और कई भक्त स्वर्ण, रजत एवं अन्य बहुमूल्य धातुएं भी अर्पित करते हैं। प्रत्येक माध्यम के लिए अलग और स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है।

खुले परिसर में होती है करोड़ों की गिनती

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि दान राशि की गिनती किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि मंदिर परिसर स्थित सत्यनारायण मंदिर के खुले प्रांगण में प्रत्येक मंगलवार और शुक्रवार को की जाती है। यहां पूरी प्रक्रिया सबके सामने संपन्न होती है। गिनती के समय एक राजपत्रित अधिकारी (एसडीएम) की मौजूदगी अनिवार्य रहती है। मंदिर के स्वयंसेवक, मुमुक्षु भवन से जुड़े सहयोगी तथा काशी में रहने वाली लगभग 20 से 25 माताएं दान की राशि को अलग-अलग श्रेणियों में छांटती हैं। इसके बाद बैंक के अधिकारी मौके पर ही लेखांकन करते हैं, लेजर में प्रविष्टियां दर्ज होती हैं और फिर पूरी राशि सीधे बैंक में जमा करा दी जाती है। बैंक की रसीद भी सरकारी अभिलेखों का हिस्सा बन जाती है।

डिजिटल दान सीधे खाते में

आधुनिक तकनीक को भी धाम ने पूरी तरह अपनाया है। क्यूआर कोड से प्राप्त होने वाला प्रत्येक डिजिटल दान बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के सीधे मंदिर के अधिकृत बैंक खाते में पहुंचता है। इससे नकदी प्रबंधन की आवश्यकता कम होती है और पारदर्शिता और अधिक मजबूत होती है।

सोने-चांदी का भी अलग प्रोटोकॉल

श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए आभूषणों और बहुमूल्य धातुओं के लिए भी अलग एसओपी लागू है। सबसे पहले उनका वजन किया जाता है, फिर शुद्धता की जांच होती है। प्रत्येक वस्तु का अलग रजिस्टर में विवरण दर्ज किया जाता है और उसके बाद उन्हें सरकारी ट्रेजरी में सुरक्षित जमा करा दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया मंदिर प्रशासन की निगरानी में होती है।

30 करोड़ श्रद्धालु... 60 हजार करोड़ की अर्थव्यवस्था

काशी विश्वनाथ धाम केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पूर्वांचल की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा इंजन भी बन चुका है। प्रतिदिन लगभग डेढ़ लाख श्रद्धालु बाबा के दर्शन करने पहुंचते हैं। सप्ताहांत में यह संख्या तीन से चार लाख तक पहुंच जाती है, जबकि महाशिवरात्रि, सावन, देव दीपावली जैसे विशेष अवसरों पर सात से आठ लाख श्रद्धालु एक दिन में दर्शन करते हैं। पिछले चार वर्षों में 30 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने बाबा विश्वनाथ के दरबार में शीश नवाया है। यदि भारत सरकार के पर्यटन संबंधी औसत व्यय के आंकड़ों के अनुसार प्रति श्रद्धालु खर्च का आकलन किया जाए तो यह संख्या वाराणसी की अर्थव्यवस्था में हजारों करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारोबार जोड़ चुकी है। होटल, धर्मशाला, नाविक, ऑटो चालक, फूल-माला विक्रेता, प्रसाद दुकानदार, बुनकर, हस्तशिल्प, रेस्टोरेंट और स्थानीय व्यापारसभी इस धार्मिक पर्यटन से लाभान्वित हो रहे हैं।

विश्वास की सबसे बड़ी पूंजी

मंदिरों में आने वाला दान केवल मुद्रा नहीं होता, वह करोड़ों लोगों की आस्था का सबसे पवित्र अंश होता है। इसलिए उसकी पारदर्शिता पर कोई भी प्रश्न पूरे धार्मिक तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। ऐसे समय में जब देश के कुछ प्रमुख धार्मिक संस्थानों की व्यवस्थाएं सवालों के घेरे में हैं, तब काशी विश्वनाथ धाम की यह व्यवस्था केवल वाराणसी ही नहीं, बल्कि देश के सभी बड़े मंदिरों के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बनकर उभरी है। यहां हर नोट की गिनती है, हर सिक्के का हिसाब है और हर दान के पीछे श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा का संकल्प है। काशी ने सदियों से केवल अध्यात्म ही नहीं, व्यवस्था का भी संदेश दिया है। बाबा विश्वनाथ के दरबार की यह व्यवस्था बताती है कि पारदर्शिता केवल नियमों से नहीं आती, बल्कि नीयत, अनुशासन और सार्वजनिक उत्तरदायित्व से आती है। यदि देश के सभी बड़े धार्मिक संस्थान इसी प्रकार खुली, जवाबदेह और तकनीक आधारित व्यवस्था अपनाएं तो दान को लेकर उठने वाले अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं। आखिर मंदिरों की सबसे बड़ी संपत्ति सोना-चांदी नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है।

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