देश के शहरों में खड़ी हैं मौत की इमारतें…!
किसी
भी
शहर
की
पहचान
उसकी
ऊंची
इमारतों
से
नहीं,
बल्कि
उनमें
रहने
और
काम
करने
वाले
लोगों
की
सुरक्षा
से
होती
है।
दुर्भाग्य
से
भारत
के
अधिकांश
शहर
आज
ऐसे
कंक्रीट
के
जंगलों
में
बदल
चुके
हैं,
जहां
विकास
की
चमक
के
पीछे
सुरक्षा
मानकों
की
अनदेखी
का
अंधेरा
छिपा
हुआ
है।
लखनऊ
का
भीषण
अग्निकांड
इसी
कड़वी
सच्चाई
का
भयावह
उदाहरण
है।
यह
केवल
एक
इमारत
में
लगी
आग
नहीं,
बल्कि
उस
प्रशासनिक
व्यवस्था
की
विफलता
है,
जिसने
वर्षों
तक
नियमों
के
उल्लंघन
को
सामान्य
मान
लिया।
हर
बड़े
हादसे
के
बाद
जांच,
निलंबन
और
मुआवजे
की
औपचारिकताएं
पूरी
हो
जाती
हैं,
लेकिन
व्यवस्था
की
कार्यशैली
जस
की
तस
बनी
रहती
है।
यदि
इस
त्रासदी
को
केवल
लखनऊ
तक
सीमित
समझने
की
भूल
की
गई,
तो
देश
का
कोई
भी
शहर
अगली
भयावह
खबर
बन
सकता
है।
अब
समय
संवेदना
व्यक्त
करने
का
नहीं,
बल्कि
सुरक्षा
को
शासन
और
समाज
दोनों
की
सर्वोच्च
प्राथमिकता
बनाने
का
है
लखनऊ की घटना ने देश को झकझोर दिया, लेकिन सच यह है कि यह किसी एक शहर की त्रासदी नहीं है। दिल्ली की तंग गलियां हों, मुंबई की ऊंची इमारतें, कोलकाता के पुराने बाजार, सूरत की फैक्ट्रियां, हैदराबाद के व्यावसायिक परिसर, बेंगलुरु के स्टार्टअप हब, जयपुर, पटना, भोपाल, कानपुर, वाराणसी, इंदौर या गुवाहाटी—भारत का शायद ही कोई बड़ा शहर हो जहां सुरक्षा नियमों से समझौता कर बनाई गई इमारतें मौत का इंतजार न कर रही हों। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं आग अभी लगी नहीं है और कहीं अगला शॉर्ट सर्किट अभी होना बाकी है। देश में पिछले दो दशकों के बड़े अग्निकांडों का इतिहास बताता है कि हर त्रासदी के बाद जांच बैठती है, रिपोर्ट बनती है, दोषियों पर मुकदमे दर्ज होते हैं, कुछ अधिकारी निलंबित होते हैं और फिर कुछ महीनों बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन व्यवस्था का चरित्र नहीं बदलता। यही कारण है कि हर नया हादसा पिछले हादसे की कार्बन कॉपी बनकर सामने आता है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ सुरक्षा संस्कृति विकसित ही नहीं हो सकी। शहर ऊंचे हो गए, इमारतें आधुनिक हो गईं, लेकिन सोच अब भी पुरानी है। भवन निर्माण के समय सबसे पहले जिस चीज की बलि दी जाती है, वह है सुरक्षा। बिल्डर लागत बचाता है, संचालक जगह बचाता है, अधिकारी जिम्मेदारी बचाता है और अंततः नागरिक अपनी जान गंवाता है।आज देश के अधिकांश शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं जिन्हें आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृति मिली थी, लेकिन उनमें कोचिंग सेंटर, हॉस्टल, अस्पताल, बैंक्वेट हॉल, गोदाम, कॉल सेंटर, कार्यालय, क्लीनिक और प्रशिक्षण संस्थान चल रहे हैं। भवन की क्षमता पचास लोगों की होती है, लेकिन रोजाना वहां दो सौ से तीन सौ लोग मौजूद रहते हैं।
बिजली की
अतिरिक्त लोडिंग, बंद खिड़कियां, संकरे
रास्ते, ज्वलनशील सामग्री, अवैध निर्माण और
इमरजेंसी एग्जिट का अभाव—यह
लगभग हर शहर की
सामान्य तस्वीर है। विडंबना यह
है कि जब तक
कोई हादसा नहीं होता, तब
तक किसी विभाग को
यह अवैधता दिखाई नहीं देती।
लेकिन जैसे ही आग लगती है, उसी इमारत की फाइलों से वर्षों पुरानी अनियमितताएं निकलने लगती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि व्यवस्था अनजान नहीं थी, बल्कि मौन थी। और कई बार यह मौन संयोग नहीं, बल्कि सुविधा का परिणाम होता है।
फायर सेफ्टी को
भारत में अब भी
एक औपचारिकता माना जाता है।
अग्निशमन यंत्र खरीद लेना ही
सुरक्षा समझ लिया जाता
है, जबकि वास्तविक सुरक्षा
नियमित निरीक्षण, कर्मचारियों के प्रशिक्षण, मॉक
ड्रिल, आपातकालीन निकासी योजना और भवन की
संरचनात्मक तैयारी से आती है।
दुर्भाग्य से इनमें से
अधिकांश व्यवस्थाएं केवल कागजों पर
मौजूद रहती हैं।
आज आवश्यकता केवल दोषियों की गिरफ्तारी की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भवन सुरक्षा सुधार अभियान की है। जिस प्रकार सड़क सुरक्षा, स्वच्छता और टीकाकरण को राष्ट्रीय मिशन बनाया गया, उसी प्रकार अग्नि सुरक्षा को भी जन आंदोलन बनाना होगा। हर राज्य में एक समयबद्ध अभियान चलाकर सभी व्यावसायिक, शैक्षणिक और सार्वजनिक भवनों का स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराया जाना चाहिए। जिन भवनों में गंभीर खामियां हों, उन्हें सुधार तक सील किया जाना चाहिए।
निरीक्षण करने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होनी चाहिए ताकि किसी दुर्घटना के बाद जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित न रहे। अब समय आ गया है कि भवन निर्माण, नगर नियोजन, अग्निशमन विभाग और विकास प्राधिकरणों के बीच मौजूद प्रशासनिक खामियों को दूर किया जाए। डिजिटल अनुमति प्रणाली, ऑनलाइन निरीक्षण रिकॉर्ड, सार्वजनिक सुरक्षा रेटिंग और नागरिक शिकायत तंत्र को मजबूत किए बिना सुधार अधूरा रहेगा।यह भी उतना ही आवश्यक है कि समाज स्वयं भी जागरूक हो। माता-पिता अपने बच्चों को जिस कोचिंग या संस्थान में भेजते हैं, वहां की सुरक्षा व्यवस्था देखने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों रखते हैं। कर्मचारियों को भी यह समझना होगा कि आपातकालीन निकास, अग्निशमन उपकरण और सुरक्षा अभ्यास केवल औपचारिक शब्द नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी हैं। सभ्यता का विकास केवल ऊंची इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से मापा जाता है कि उन इमारतों के भीतर रहने और काम करने वाले लोग कितने सुरक्षित हैं।
यदि भारत 'विकसित राष्ट्र' बनने का सपना देख रहा है, तो उसे 'सुरक्षित राष्ट्र' बनने की दिशा में भी उतनी ही गंभीरता से कदम बढ़ाने होंगे। लखनऊ की राख से उठता धुआं केवल उत्तर प्रदेश के आसमान में नहीं फैला है। वह पूरे भारत की अंतरात्मा से एक प्रश्न पूछ रहा है—क्या अगली आग भी किसी जांच आयोग का इंतजार करेगी, या इस बार व्यवस्था सचमुच बदलेगी? यदि इस प्रश्न का उत्तर आज नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में किसी दूसरे शहर की कोई दूसरी इमारत फिर यही कहानी दोहराएगी, और हम एक बार फिर शोक, संवेदना और मुआवजे के पुराने चक्र में लौट आएंगे।क्या पूर्वांचल ने सबक लिया या अगली दुर्घटना का इंतजार है?काशी की गलियां पूछ रही हैं — क्या हम सुरक्षित हैं? कहीं देर न हो जाए...!
कोचिंग और लाइब्रेरी कल्चर नई चिंता
शहर में तेजी
से बढ़े कोचिंग और
लाइब्रेरी कल्चर ने भी नई
चिंता पैदा कर दी
है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने
वाले हजारों छात्र सुबह से देर
रात तक इन संस्थानों
में रहते हैं। कई
लाइब्रेरी बेसमेंट या ऊपरी मंजिलों
में संचालित हैं। कहीं पर्याप्त
वेंटिलेशन नहीं, कहीं केवल एक
सीढ़ी और कहीं अग्निशमन
उपकरणों की नियमित जांच
तक नहीं होती। निजी
अस्पतालों और नर्सिंग होम
की स्थिति भी चिंता का
विषय है। कई छोटे
अस्पताल घनी आबादी के
बीच संचालित हैं, जहां पार्किंग
की जगह भी नहीं
है। मरीजों, ऑक्सीजन सिलेंडरों और बिजली पर
निर्भर उपकरणों के बीच यदि
आग लग जाए तो
राहत कार्य और अधिक कठिन
हो सकता है।
भदोही में भी कई गोदाम मानकों के अनुरूप
नहीं
वाराणसी से लगभग 45 किमी
दूर भदोही का कालीन उद्योग
देश की पहचान है।
यहां हजारों छोटे-बड़े गोदामों
में ऊन, धागा, कपड़ा,
पैकिंग सामग्री और अन्य ज्वलनशील
वस्तुएं रखी जाती हैं।
कई गोदाम औद्योगिक मानकों के अनुरूप हैं,
लेकिन अनेक छोटे स्टोरेज
और कार्यस्थलों में सुरक्षा व्यवस्था
को लेकर समय-समय
पर सवाल उठते रहे
हैं। यदि किसी ऐसे
गोदाम में आग लगती
है तो नुकसान केवल
आर्थिक नहीं होगा, बल्कि
सैकड़ों परिवारों की आजीविका भी
प्रभावित होगी। यही तस्वीर मिर्जापुर,
जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, आजमगढ़, बलिया और गोरखपुर के
कई व्यावसायिक क्षेत्रों में भी दिखाई
देती है। कहीं होटल
हैं, कहीं मैरिज लॉन,
कहीं निजी अस्पताल, कहीं
कोचिंग सेंटर और कहीं बड़े
गोदाम। सवाल किसी एक
शहर का नहीं, बल्कि
पूरे पूर्वांचल के शहरी ढांचे
का है।
पहले भी हो चुके है अग्निकांड के हादसे
देश पहले भी
ऐसी त्रासदियों से सबक लेने
की कोशिश कर चुका है।
2019 में सूरत के कोचिंग
सेंटर में आग लगी
तो दर्जनों छात्रों की मौत ने
पूरे देश को झकझोर
दिया। दिल्ली के अनाज मंडी
अग्निकांड ने संकरी गलियों
और अवैध निर्माण की
भयावह तस्वीर दिखाई। कोलकाता के अस्पताल और
होटल अग्निकांड ने यह साबित
किया कि अग्नि सुरक्षा
में छोटी-सी लापरवाही
भी सामूहिक त्रासदी में बदल सकती
है। हर घटना के
बाद जांच बैठी, नियम
बने, अभियान चले, लेकिन समय
बीतते ही अधिकांश व्यवस्थाएं
फिर पुराने ढर्रे पर लौट गईं।
इस पूरी व्यवस्था में
नागरिकों की भूमिका भी
कम महत्वपूर्ण नहीं है। भवन
मालिक अधिक किराया कमाने
के लिए क्षमता से
अधिक लोगों को एक ही
भवन में ठहराते हैं।
कई संस्थान सुरक्षा पर खर्च को
अतिरिक्त बोझ मानते हैं।
दूसरी ओर लोग भी
किसी होटल, हॉस्टल, अस्पताल या कोचिंग में
प्रवेश करते समय यह
देखने की जरूरत नहीं
समझते कि आपातकालीन निकास
कहां है और आग
लगने पर बाहर निकलने
का रास्ता क्या होगा। लखनऊ
की आग अब बुझ
चुकी है, लेकिन उसके
धुएं ने पूरे प्रदेश
को एक आईना दिखा
दिया है। यह आईना
बता रहा है कि
यदि आज भी सुरक्षा
मानकों को गंभीरता से
नहीं लिया गया, यदि
अवैध निर्माण, बंद निकास मार्ग,
खराब अग्निशमन व्यवस्था और कागजी अनुपालन
की संस्कृति नहीं बदली गई,
तो अगली त्रासदी का
शहर कोई भी हो
सकता है—वाराणसी, भदोही,
मिर्जापुर, गोरखपुर या पूर्वांचल का
कोई और नगर।
कागजी एनओसी पर्याप्त नहीं
फायर विभाग समय-समय पर जागरूकता
अभियान चलाता है, लेकिन विशेषज्ञ
मानते हैं कि केवल
कागजी एनओसी पर्याप्त नहीं है। वास्तविक
सुरक्षा तभी संभव है
जब उपकरण चालू हालत में
हों, कर्मचारियों को प्रशिक्षण मिला
हो, मॉक ड्रिल नियमित
हो और आपातकालीन निकास
हमेशा खुला रखा जाए।
स्थानीय लोगों का भी कहना
है कि शहर में
अनेक भवन आवासीय नक्शे
पर बने, लेकिन बाद
में उन्हें व्यावसायिक उपयोग में बदल दिया
गया। कहीं हॉस्टल खुल
गए, कहीं कोचिंग, कहीं
होटल और कहीं रेस्टोरेंट।
इससे भवनों पर भार भी
बढ़ा और जोखिम भी।
कार्रवाई केवल छोटे प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए
व्यापारिक संगठनों का कहना है कि कार्रवाई केवल छोटे प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि सुरक्षा मानकों की जांच हो रही है तो सभी संस्थानों पर समान रूप से लागू हो। वहीं नागरिकों का मानना है कि हादसे के बाद कुछ दिनों तक अभियान चलता है, फिर व्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आती है। काशी हर दिन लाखों श्रद्धालुओं, पर्यटकों, विद्यार्थियों और मरीजों की मेजबानी करती है। ऐसे में आवश्यकता केवल अभियान चलाने की नहीं, बल्कि स्थायी व्यवस्था विकसित करने की है। क्योंकि हादसे के बाद राहत पहुंचाना कठिन होता है, लेकिन हादसे को रोकना कहीं अधिक आसान और प्रभावी।








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