Sunday, 21 September 2025

काशी के घाटों व कुंडों के तट पर पितरों को लाखों ने किया पिंडदान

स्मृति, श्रद्धा और सनातन परंपरा का अनुपम मिलन

काशी के घाटों कुंडों के तट पर पितरों को लाखों ने किया पिंडदान 

आस्था और कृतज्ञता का विराट अनुष्ठान, तालाबों, कुंडों और घाटों पर गूंजे मंत्र

सुरेश गांधी

वाराणसी। काशी के घाटों का किनारा रविवार को स्मृतियों से सराबोर था। धूप की हल्की किरणें गंगा की लहरों पर सुनहरी आभा बिखेर रही थीं, और मंत्रोच्चार की लय में पूर्वजों का आह्वान गूंज रहा था। पितृ पक्ष के अंतिम दिन माता-पिता, नाना-नानी से लेकर अनगिनत पीढ़ियों के ज्ञात-अज्ञात पुरखों के नाम पर पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण का दृश्य ऐसा लगा मानो समय स्वयं अपनी जड़ों को नमन कर रहा हो। या यूं कहे काशी एक बार फिर सनातन परंपरा की जीवंत प्रतिमूर्ति बन गई। गंगा के घाट, प्राचीन तालाब और पवित्र कुंड, हर ओर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। लाखों लोग अपने पितरों को अंतिम नमन करने, उनकी आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना में पिंडदान के लिए पहुंचे। 

दिन ढलते-ढलते मंत्रों की गूंज गंगा की लहरों में घुल गई। दीपक की टिमटिमाती लौ में आस्था का उजास झिलमिलाया। यह केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस सनातन कृतज्ञता का उत्सव था, जिसमें वंशज अपने पूर्वजों के प्रति ऋण स्वीकारते हैं। देश के कोने-कोने, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु तक से लोग इस पुण्य क्षण के सहभागी बनने पहुंचे। तीर्थपुरोहितों की चौकियों पर घंटों लगी रही श्रद्धालुओं की कतारें। वेदियों पर सजाई गईं ध्वज-पताकाएं हवा में लहरातीं तो लगता, जैसे पीढ़ियों की अदृश्य आभा संगम की लहरों में घुल रही हो। काशी के घाटों पर आज का हर कण यही कह रहा था, हम अपनी जड़ों से जुड़े हैं, और उन्हीं में हमारी आत्मा का स्थायी ठिकाना है।

सुबह से ही दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, अस्सी और पंचगंगा घाट पर वैदिक मंत्रों की गूंज वातावरण को पवित्र करती रही। पुरोहितों ने वेदपाठ और आह्वान के साथ तालाब-कुंडों के किनारे विधि-विधान से पूजन कराया। परिवारों ने अपने माता-पिता, दादा-दादी और अनगिनत पीढ़ियों के नाम पर जल अर्पण किया, तिल-तर्पण और अन्न-दान से पूर्वजों को कृतज्ञता का संदेश दिया। काशी का यह दृश्य केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि स्मृति और संबंध का उत्सव था। हर दीप, हर फूल और हर अर्पित तिलकण यह बता रहा था कि वंशज अपनी जड़ों को याद रखते हैं, और गंगा की अनंत धारा में पितरों का आशीष लेकर जीवन की निरंतरता को संजोते हैं।

मान्यता है कि पूरे पितृ पक्ष में यदि कोई अपने पितरों का स्मरण कर पाए, तो विसर्जन तिथि पर किया गया अन्न-वस्त्र का दान और मनपसंद व्यंजनों का भोग ही पूर्ण फल देता है। इसी विश्वास से प्रेरित होकर लोग तिल, स्वर्ण, चांदी, घी, गुड़, फल और पितरों की प्रिय वस्तुएं अर्पित करते रहे। ब्राह्मणों को आदर सहित भोजन कराया गया, गायों को खीर-पूरी और रसगुल्ले का प्रसाद मिला, कौओं और चींटियों तक के लिए अन्न निकाला गया, क्योंकि मान्यता है कि इन सबके माध्यम से पितरों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है।

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